16/02/2021  :  16:08 HH:MM
महिला दिवस पर निबंध
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प्रत्येक वर्ष 8 मार्च पुरे विश्व में महिलाओं के योगदान एवं उपलब्धियों की तरफ लोगो का ध्यान क्रेंदित करने के लिए महिला दिवस के रूप में मनाया जाता है, महिला दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य नारी को समाज में एक सम्मानित स्थान दिलाना और उसके स्वयं में निहित शक्तियों से उसका ही परिचय कराना होता है।

अपने व्यक्तित्व को समुन्नत बनाकर राष्ट्रीय समृद्धि के संबंध में नारी कितना बड़ा योगदान दे सकती है इसे उन देशों में जाकर आंखों से देखा या समाचारों से जाना जा सकता है जहां नारी को मनुष्य मान लिया गया है और उसके अधिकार उसे सौंप दिए गए हैं, नारी उपयोगी परिश्रम करके देश की प्रगति में योगदान तो दे ही रही है साथ ही साथ परिवार की आर्थिक समृद्धि भी बढ़ा रही है और इस प्रकार सुयोग्य बनकर रहने पर अपने को गौरवान्वित अनुभव कर रही है, जिससे परिवार को छोटा सा उद्यान बनाने और उसे सुरक्षित पुष्पों से भरा भूरा बनाने में सफल हो रही है।
अगर हम इतिहास की माने तो हम ये पाते हैं की नारी ने पुरुष के सम्मान एवं प्रतिष्ठा के लिए स्वयं की जान दांव पर लगा दी, नारी के इसी पराक्रम के चलते यह कहावत सर्वमान्य बन कर साबित हुई की प्रत्येक पुरुष की सफलता के पीछे एक स्त्री का हाथ होता है। प्रत्येक दिवस मनाया जाना वाला ये उत्सव, माफ़ कीजियेगा मैंने उत्सव शब्द का प्रयोग महिला दिवस के परिपेछ्य में इसलिए किया है की मेरा ऐसा मानना है की ये उत्सव ही तो है जहाँ वर्ष में कम से कम एक दिन सम्पूर्ण सृष्टि का सृजन करने वाली नारी शक्ति के योगदान की पुरे विश्व में सराहना की जाती है, ये तो सर्वविदित है की समाज निर्माण में जितना योगदान पुरुषों का होता है उतना ही योगदान स्त्री का भी परन्तु जिस प्रकार का सम्मान पुरुषो को समाज में मिलता है उतना स्त्री को नहीं मिल पाता है, इसका प्रमुख कारण समाज की संक्रिण सोच महिलाओं को लेकर, परन्तु अब समय बदल गया है कुछ वर्षो पहले तक बहुत से ऐसे खेल थे जिसमे नारी को शारीरिक रूप से दुर्बल समझ कर खेलने से रोका जाता था आज उन्ही खेलों में वो अपना परचम लहरा रही हैं, फिर तो चाहे बात हो मुक्केबाज़ी, भारोत्तोलन, बैडमिंटन या फिर टेनिस की।
नारी देवत्व की प्रतिमा है, दोष तो सब में रहते हैं सर्वथा निर्दोष तो एक परमात्मा है अपने घर की नारियों में भी दोष हो सकते हैं पर तात्विक दृष्टि से नारी की अपनी विशेषता है उसकी आध्यात्मिक प्रवृत्ति। पुरुषार्थ प्रधान पुरुष अपनी जगह ठीक है पर आत्मिक संपदा की दृष्टि से वो पीछे ही रहेगा, द्रुत गति से बढ़ता आ रहा नवयुग निश्चित रूप से अध्यात्म चेतना से भरा-भूरा होगा मनुष्यों का चिंतन दृष्टिकोण उसी स्तर का होगा अवस्थाएं परंपरा उसी ढांचे में ढलेगी, जनसाधारण की गतिविधियां भी उसी दिशा में होगी ऐसी स्थिति में नारी को हर क्षेत्र में विशेष भूमिका निभानी पड़ेगी, उपर्युक्त परिस्थितियों में यह कथन सर्वथा सत्य साबित होता है।
वर्तमान युग को नारी उत्थान का युग कहा जाय तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी, आज हमारे देश भारत की महिलाएं हर क्षेत्र में अपना पताका फेहरा रही है, मौजूदा सरकारें भी महिलाओं को हर क्षेत्र में अपना भविष्य निर्माण करने का अवसर उपलब्ध करा रही हैं जो महिलाओं के विकास के लिए रामबाण साबित हो रहा है।
वर्तमान में पुरुष के कंधे से कंधा मिलाकर चलने वाली नारी किसी पर भार नहीं बनती वरन अन्य साथियों को सहारा देकर प्रसन्न होती है, यदि हम सभी विदेशी भाषा एवं पोशाक को अपनाने में गर्व महसूस करते हैं तो क्या ऐसा नहीं हो सकता कि उनके व्यवहार में आने वाले सामाजिक न्याय की नीति को अपनाएं और कम से कम अपने घर में नारी की स्थिति सुविधाजनक एवं सम्मानजनक बनाने में भी पीछे ना रहे।
उपर्युक्त निबंध का अंत मैं जयशंकर प्रसाद की एक ख़ूबसूरत कविता के माध्यम से करना चाहूंगा।
नारी तुम केवल श्रद्धा हो
विश्वास-रजत-नग-पगतल में
पियूष-स्त्रोत सी बहा करो
जीवन के सुन्दर समतल में






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